ब्लॉक ब्यूरो प्रतापपुर अनिरुद्ध कुमार
6 दिन पहले सिलेंडर बुक किया था मैंने कल सुबह हमेशा की तरह 5 दिन में लाकर दे दिया, जब मैंने भैया से गैस की किल्लत को लेकर सवाल किया तो कहने लगा अरे मेडम;
इस युद्ध के चक्कर मे हमारी मट्टी पलीत हो गई, बुकिंग बढ़ गई और जब डिलीवर करने जाते हैं तो लोगों के पुराने सिलेंडर में दो से ढाई किलो गैस बाकी होती है और एक पहले से भरा रखा है, महिलाएं फिर टँकी तुलवाकर चेक करती हैं जबकि हफ्ते भर बाद बुक करेंगी तब भी हम 5 दिनों में तो ला ही देंगे और दूसरा सिलेंडर एक महीना तो चलता ही चलता है।
कई लोग तीन-तीन सिलेंडर रख रहे, आस पड़ोस के लोग जो कम रहते हैं उनके भी ले लेकर भरवाकर रख रहे हैं, क्या करें ड्यूटी है सो करनी है पर इनके चक्कर मे जिनको जरूरत है वो परेशान हो रहे।
बड़ी जनसंख्या वाले देश मे आधी से ज्यादा परिस्थिति तो पैनिक बाईंग करने वाले बिगाड़ देते हैं, कोविड जब आया तो डॉक्टर्स ने साफ कहा आस पास साबुन या धोने की व्यवस्था न हो तो हैंड सेनेटाइज़ करें।
लोगों ने सेनेटाइजर को कोई कोरोना नाशक समझ लिया और साबुन, हैंडवाश सबकुछ छोड़कर बस दौड़ पड़े सेनेटाइजर खरीदने, अचानक से कीमतें बढ़ गई, स्टॉक खत्म हो गया लोगों ने नकली सेनेटाइजर बनाने शुरू कर दिए।
लोगों ने बीमारी की आशंका में रेमडीसीबर के स्टॉक कर लिए फिर जिन्हें जरूरत थी उन्हें मिल ही नहीं पाए।
ऑपरेशन सिंदूर के समय सरकार ने मॉकड्रिल करवाई तो लोग दौड़ पड़े राशन लेने अचानक से तेल, दाल और इशेंशियल्स कि केमतें बढ़ गई, और अब इंडक्शन एयर फ्रायर, गैस की कीमतें अचानक से बढ़ गई।
इसका सबसे बड़ा कारण ये बड़े बड़े विद्वान हैं जो युद्ध, महामारी, अकाल के संभावित प्रभाव बताने निकल पड़ते हैं फिर चीजों की किल्लत और महंगाई की खबरें वायरल होती है और अच्छा खासा सायकल डिस्टर्ब हो जाता है।
अब सबको पता चल गया कि दो गैस के जहाज आ गए तो देखना सिलेंडर की लाईन में भीड़ कम हो जाएगी, कालाबाजारी भी नियंत्रित हो जाएगी और कोई भूखा भी नहीं मरेगा जबकि इन जहाजों में बस उतनी गैस है कि पूरे देश की कुल खपत के तीन दिन की आपूर्ति हो सकती है।
तो सर्पदंश के ज़हर से उतने नहीं मरते जितने डर के
मारे मर जाते हैं, भय में लोग सुदबुध खो देते हैं।😂
